Class 7 Hindi Chapter 8: बिरजू महाराज से साक्षात्कार
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- Hindi
संघर्ष, अम्मा और तालीम
बिरजू महाराज बताते हैं कि एक समय उनका परिवार छोटे नवाब कहलाता था, पर बाबूजी के देहांत के बाद तंगी आ गई। अम्मा उनकी सबसे बड़ी सहयोगी रहीं और अभ्यास न रुकने दिया। कथक उन्होंने पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू और लच्छू महाराज से सीखा।
What you will be able to do
- मैं बिरजू महाराज के बचपन के संघर्ष बता सकता/सकती हूँ।
- मैं बता सकता/सकती हूँ कि अम्मा ने किस तरह सहारा दिया।
- मैं उनके तीन गुरुओं के नाम बता सकता/सकती हूँ।
- मैं गंडा बाँधने की रस्म और उसमें किए बदलाव को समझा सकता/सकती हूँ।
- मैं बता सकता/सकती हूँ कि नौकरी के साथ कला निभाने पर उनका मत क्या है।
Key points
एक समय उनका परिवार छोटे नवाब कहलाता था।
हवेली के दरवाज़े पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा रहता था।
बाबूजी के देहांत के बाद आर्थिक परेशानियाँ बढ़ने लगीं।
जिन डिब्बों में पहले कीमती हार रहते थे, वे अब खाली पड़े थे।
संघर्ष के दिनों में उनकी सबसे बड़ी सहयोगी उनकी अम्मा थीं।
कभी कर्ज़ लेना पड़ता और कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर तार बेचने पड़ते।
दिन में भोजन मिलता तो रात को कई बार नहीं भी मिलता था।
अम्मा बार-बार कहती थीं कि कुछ भी मिले या न मिले, अभ्यास ज़रूर करो।
उनके गुरु थे पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज।
Full explanation
साक्षात्कार क्या होता है
यह पाठ कोई कहानी या निबंध नहीं है। यह एक साक्षात्कार है, यानी प्रश्न पूछकर किसी की बात जानने का ढंग। यहाँ प्रश्न पूछने वाले बड़े पत्रकार नहीं हैं। श्रेया, तनुश्री और माणिक नाम के बच्चे पूछते हैं, और उत्तर बिरजू महाराज देते हैं।
कथक और विरासत
कथक की बात होते ही बिरजू महाराज का नाम याद आता है। उन्हें यह कला विरासत में मिली थी, यानी पिछली पीढ़ी से। उनकी प्रस्तुतियों के लिए उन्हें भारत के साथ विदेशों में भी याद किया जाता है। उन्हें पद्मविभूषण सम्मान मिला था।
पहले का ठाठ
पहला प्रश्न बचपन का है। वे बताते हैं कि एक ज़माना था जब वे लोग छोटे नवाब कहलाते थे। हवेली के दरवाज़े पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा रहता था। यह सुनकर लगता है कि उनका बचपन सुख में बीता होगा।
पिता के बाद तंगी
पर आगे वे उलटी बात कहते हैं। बाबूजी के देहांत के बाद घर की आर्थिक परेशानियाँ बढ़ने लगीं। वे एक छोटा ब्योरा देते हैं, कि जिन डिब्बों में पहले बहुत कीमती हार रहते थे, वे अब खाली पड़े थे। यह एक ही वाक्य पूरा बदलाव दिखा देता है।
समय का चक्र
वे इस बदलाव पर शिकायत नहीं करते। उनका कहना है कि जीवन में उतार-चढ़ाव तो होता ही है और यह सब समय का चक्र है। यह उनके स्वभाव की पहली पहचान है। जो बीत गया, उसे वे एक स्वाभाविक बात मान लेते हैं।
अम्मा का सहारा
संघर्ष के उन दिनों में उनकी सबसे बड़ी सहयोगी उनकी अम्मा थीं। कई काम करने पड़े। कभी कर्ज़ लेना पड़ता था। कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचने पड़ते थे। कभी-कभी नृत्य के कार्यक्रमों से थोड़ा पैसा आ जाता था।
आधे पेट के दिन
हालत कितनी कठिन थी, यह वे एक पंक्ति में बता देते हैं। दिन में भोजन मिल जाता था, तो रात को कई बार नहीं भी मिलता था। इतनी तंगी में कला छोड़ देना सबसे आसान रास्ता होता, पर घर में ऐसा नहीं हुआ।
अम्मा का नियम
अम्मा बार-बार एक ही बात कहती थीं। कुछ भी खाने को मिले, या कुछ भी न मिले, अभ्यास ज़रूर करो। यह वाक्य पूरे पाठ का सबसे मज़बूत वाक्य है। इसमें भोजन और अभ्यास को आपस में तौला गया है, और अभ्यास भारी पड़ा है।
तीन गुरु
दूसरा प्रश्न यह है कि कथक किससे सीखा। उनके गुरु तीन थे, पिता अच्छन महाराज तथा चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज। यानी उनका परिवार ही उनका विद्यालय था।
माहौल से सीखना
घर में कथक का माहौल था, इसलिए औपचारिक तालीम शुरू होने से पहले ही वे देख-देखकर सीख गए थे। वे नवाब के दरबार में नाचने भी लगे थे। इससे पता चलता है कि माहौल भी एक शिक्षक होता है, जो चुपचाप पढ़ाता रहता है।
गंडा की रस्म
अब वे एक रस्म बताते हैं। कथक की तालीम शुरू करते समय गुरु अपने शिष्य को गंडा बाँधते हैं, जो एक ताबीज़ होता है। बदले में शिष्य गुरु को भेंट देता है। गंडा गुरु और शिष्य के बीच का पवित्र रिश्ता माना जाता है।
भेंट की शर्त
उनकी तालीम आरंभ होने की बात चली, तो बाबूजी ने शर्त रख दी कि भेंट मिलने पर ही गंडा बाँधेंगे। यहाँ अम्मा फिर सामने आती हैं। उन्होंने बिरजू महाराज के दो कार्यक्रमों से जो पैसा आया था, वही बाबूजी के सामने भेंट रख दिया।
रस्म उलटी कर दी
आगे चलकर उन्होंने इस रस्म को उलटा कर दिया। अब वे पहले गंडा नहीं बाँधते। कई वर्षों तक नृत्य सिखा चुकने के बाद जब उन्हें दिखता है कि शिष्य में सच्ची लगन है, तभी वे गंडा बाँधते हैं। यानी पहले परख, फिर रिश्ता।
बदलाव का कारण
यह बदलाव क्यों किया, यह सोचने की बात है। पहले वाली रस्म में भेंट देने की सामर्थ्य परखी जाती थी। उनकी नई रस्म में शिष्य की लगन और समर्पण परखा जाता है। उनके बचपन की तंगी देखते हुए यह बदलाव और अर्थपूर्ण लगता है।
नौकरी और कला साथ
तीसरा प्रश्न यह है कि पढ़ाई या दूसरे कामों के साथ कला जारी रखना संभव है या नहीं। उनका उत्तर सीधा है, कि यह अपने सामर्थ्य पर निर्भर करता है। वे कोई नियम नहीं बनाते, वे ज़िम्मा व्यक्ति पर छोड़ देते हैं।
दो उदाहरण
वे उत्तर के साथ उदाहरण भी देते हैं। उनकी शिष्या शोभना नारायण आई.ए.एस. अफ़सर थीं और अच्छी नर्तकी भी। वे स्वयं भी एक काम नहीं करते। वे नृत्य के साथ बजाते और गाते भी हैं, और नृत्य नाटिकाएँ तथा उनके लिए संगीत भी तैयार करते हैं।
चाचा की चेतावनी
जब उन्होंने नौकरी शुरू की, तो चाचा ने चेताया कि तुम नौकरी में बँट जाओगे। उनका डर यह था कि भीतर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा। बिरजू महाराज ने इसे मना नहीं किया, पर अपना रास्ता नहीं छोड़ा। उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि महाराज बनना है तो उसके वास्ते मेहनत भी करनी होगी।
Concepts and terms
किसी व्यक्ति से प्रश्न पूछकर उसकी बात जानने का ढंग। इस पाठ में श्रेया, तनुश्री और माणिक नाम के बच्चे प्रश्न पूछते हैं और बिरजू महाराज उत्तर देते हैं।
पिछली पीढ़ी से मिली चीज़ या कला। कथक उन्हें परिवार से मिला था, इसलिए उसे विरासत कहा गया है।
किसी कला की विधिवत शिक्षा। घर का माहौल होने से वे औपचारिक तालीम शुरू होने से पहले ही देख-देखकर सीख गए थे।
एक ताबीज़, जो तालीम शुरू करते समय गुरु अपने शिष्य को बाँधते हैं। यह गुरु और शिष्य के बीच का पवित्र रिश्ता माना जाता है।
किसी काम को कर पाने की अपनी शक्ति और क्षमता। उनके अनुसार नौकरी के साथ कला निभाना हर व्यक्ति के अपने सामर्थ्य पर निर्भर करता है।
यहाँ ध्यान रखिए
आम भ्रम
एक छोटा प्रसंग
Scenario:
सातवीं कक्षा की रुख़साना तबला सीखती है। उसके पिता की दुकान पिछले साल बंद हो गई और घर का ख़र्च चलाना कठिन हो गया। उसकी तबले की कक्षा की फ़ीस दो महीने से बाक़ी थी। रुख़साना ने सोचा कि अब सीखना छोड़ देना चाहिए। उसकी माँ ने कहा कि कक्षा छूट जाए तो छूट जाए, पर रोज़ का रियाज़ नहीं छूटेगा। उन्होंने घर की एक पुरानी बाल्टी उलटी रखकर उस पर अभ्यास करने को कहा। चार महीने बाद उनके उस्ताद ने देखा कि रुख़साना की लय बिगड़ी नहीं है, बल्कि सुधर गई है। उन्होंने उसकी फ़ीस माफ़ कर दी और कहा कि ऐसी लगन कम दिखती है।
Analysis:
यह प्रसंग इस साक्षात्कार के दो हिस्सों को एक साथ दोहरा देता है। पहला हिस्सा अम्मा का नियम है, कि कुछ मिले या न मिले, अभ्यास ज़रूर करो। रुख़साना की माँ ने ठीक वही बात कही, और उलटी बाल्टी पर भी रियाज़ चलने दिया। दूसरा हिस्सा गंडा की नई रस्म है। उस्ताद ने फ़ीस की सामर्थ्य नहीं देखी, उन्होंने चार महीने की लगन देखी और उसी पर भरोसा किया। यही बिरजू महाराज का उलटा क्रम है, यानी पहले परख, फिर रिश्ता। ध्यान देने की बात यह भी है कि दोनों जगह साधन कम थे, पर अभ्यास का समय कम नहीं हुआ।
Activity:
अपनी कॉपी में कोई एक कौशल लिखिए जो आप सीख रहे हैं। उसके सामने लिखिए कि साधन कम हो जाने पर आप अभ्यास किस तरह जारी रख सकते हैं।
साक्षात्कार कीजिए
Title:
साक्षात्कार कीजिए
Safety:
किसी साथी से उसके घर की आर्थिक बातें न पूछिए, प्रश्न केवल कौशल और अभ्यास तक रखिए।
What You Notice:
आप देखेंगे कि जो प्रश्न कठिनाई के बारे में होते हैं, उनके उत्तर सबसे रोचक निकलते हैं। इस पाठ में भी बचपन के संघर्ष वाला पहला उत्तर सबसे लंबा और सबसे गहरा है।
Did you know
बिरजू महाराज को पद्मविभूषण सम्मान मिला था।
भारत ही नहीं, विदेशों में भी उनकी मनमोहक प्रस्तुतियों के लिए उन्हें याद किया जाता है।
औपचारिक तालीम शुरू होने से पहले ही वे नवाब के दरबार में नाचने लगे थे।
Memory tricks
तीन गुरु — अच्छन महाराज, शंभू महाराज और लच्छू महाराज।
अम्मा का नियम — भोजन मिले या न मिले, अभ्यास न रुके।
Practice MCQs with answers (25)
- A साक्षात्कार के रूप में
- B किसी लंबी कहानी के रूप में
- C किसी लंबी कविता के रूप में
- D किसी लंबे पत्र के रूप में
Show answer
Why:
इसमें प्रश्न और उत्तर बारी-बारी से चलते हैं।
- A प्रश्न बहुत कठिन और औपचारिक हो जाते हैं
- B बातचीत सहज और अपनेपन वाली लगती है
- C उत्तर छोटे हो जाते हैं
- D पाठ का पूरा विषय ही बदलकर कुछ और हो जाता है
Show answer
Why:
इसी कारण उत्तरों में घर की बातें भी खुलकर आ जाती हैं।
- A कोई नया आविष्कार
- B कोई बाज़ार से ख़रीदी हुई वस्तु
- C पिछली पीढ़ी से मिली चीज़
- D सरकार की ओर से मिला कोई सम्मान
Show answer
Why:
कथक उन्हें परिवार से मिला था, इसलिए वह उनकी विरासत है।
- A छोटे नवाब
- B बड़े उस्ताद
- C कथक गुरु
- D लखनऊ घराना
Show answer
Why:
उस समय हवेली के दरवाज़े पर पहरा भी रहता था।
- A कथक की शुरुआत और उसका परिचय देने के
- B हवेली का पूरा नक़्शा समझाने के लिए
- C पहले के ठाठ-बाट का अंदाज़ा देने के
- D हवेली में रहने वाले नवाब का नाम बताने के
Show answer
Why:
ऊँचाई दिखाने के बाद आगे की गिरावट अधिक साफ़ दिखती है।
- A उनके बाबूजी के देहांत हो जाने के बाद
- B उनके अपनी नौकरी छोड़ देने के बाद
- C उनके अचानक विदेश चले जाने के बाद
- D उनकी औपचारिक तालीम शुरू होने के बाद
Show answer
Why:
उसके बाद घर का सहारा अम्मा बनीं।
- A वह घर का पता और उसकी गली बता देता है
- B वह पूरी हवेली का आकार और बनावट बता देता है
- C वह एक वाक्य में पूरा बदलाव दिखा देता है
- D वह तालीम का समय और उसका वर्ष बता देता है
Show answer
Why:
पहले वहाँ कीमती हार रहते थे और अब कुछ नहीं बचा।
- A वे किसी को दोष देते हैं
- B वे उसे अपनी भूल मानते हैं
- C वे उस बात की चर्चा ही टाल देते हैं
- D वे उसे समय का स्वाभाविक चक्र मानते हैं
Show answer
Why:
यही उनके स्वभाव की पहली पहचान है।
- A लखनऊ की वह पुरानी हवेली भी पूरी तरह बेच दी गई थी
- B कर्ज़ लिया गया और ज़री की साड़ियों के तार बेचे गए
- C कुछ समय के लिए कथक का अभ्यास पूरी तरह छोड़ दिया गया
- D घर बदलकर किसी छोटी जगह में चले जाना पड़ा था, मजबूरी में
Show answer
Why:
कभी-कभी नृत्य के कार्यक्रमों से भी थोड़ा पैसा आ जाता था।
- A कपड़े पर सोने-चाँदी के तार का काम
- B कपड़े पर लगाया जाने वाला कोई गाढ़ा रंग
- C किसी ख़ास मौके पर बनने वाला एक तरह का भोजन
- D कोई पुराना बरतन
Show answer
Why:
इसीलिए साड़ियाँ जलाकर उनके तार बेचे जा सकते थे।
- A हवेली के दरवाज़े से पहरा हट गया था
- B कार्यक्रम कम हो गए
- C रात को कई बार भोजन नहीं मिलता था
- D डिब्बे खाली पड़े थे
Show answer
Why:
इतनी तंगी में कला छोड़ देना सबसे आसान रास्ता होता।
- A कि पढ़ाई को सबसे पहले रखो, बाक़ी सब बाद में
- B कि कर्ज़ कभी न लो, चाहे कितनी ही तंगी आ जाए
- C कि घर का काम देखो
- D कि कुछ मिले या न मिले, अभ्यास ज़रूर करो
Show answer
Why:
इसमें भोजन और अभ्यास को तौला गया है, और अभ्यास भारी पड़ा है।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
I और III सही हैं। दूसरा कथन साक्षात्कार में नहीं है; वहाँ पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर तार बेचने की बात आती है।
- A केवल उनके पिता
- B केवल उनके दोनों चाचा
- C पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू तथा लच्छू महाराज
- D लखनऊ घराने के बाहर के कुछ प्रसिद्ध उस्ताद और गुरु
Show answer
Why:
यानी उनका परिवार ही उनका विद्यालय था।
- A किसी किताब से पढ़कर
- B घर के माहौल में देख-देखकर
- C दरबार में किसी से पूछकर
- D किसी विद्यालय में जाकर
Show answer
Why:
इससे पता चलता है कि माहौल भी एक शिक्षक होता है।
- A एक प्रकार का वाद्य
- B एक ताबीज़
- C एक नृत्य-मुद्रा
- D एक प्रकार की पोशाक
Show answer
Why:
तालीम शुरू करते समय गुरु उसे शिष्य के बाँधते हैं।
- A ग़रीब घर का योग्य बच्चा पीछे रह जाता
- B गुरु को अपना शिष्य पसंद ही नहीं आता था
- C तालीम बहुत लंबी हो जाती
- D शिष्य को ताबीज़ न मिलता
Show answer
Why:
बिरजू महाराज के साथ भी यही अड़चन आई थी।
- A उनके चाचा ने, अपनी सारी जमा-पूँजी लगाकर ही
- B नवाब ने, अपने दरबार की सारी कमाई लगाकर
- C अम्मा ने, उनके दो कार्यक्रमों की कमाई से
- D किसी शिष्य ने, अपनी सारी जमा-पूँजी लगाकर
Show answer
Why:
अम्मा यहाँ दूसरी बार सहारा बनकर सामने आती हैं।
- A उन्होंने गंडा बाँधना बंद कर दिया
- B उन्होंने शिष्यों से भेंट लेना पूरी तरह बंद कर दिया
- C उन्होंने गंडा केवल अपने परिवार में बाँधा
- D वे पहले सिखाते हैं, और लगन देखकर ही गंडा बाँधते हैं
Show answer
Why:
यानी पहले परख, फिर रिश्ता।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है। वे पहले सिखाते हैं और लगन देखकर ही गंडा बाँधते हैं, इसलिए भेंट आगे खिसक जाती है।
- A यह किसी के लिए भी असंभव है, कोई कर ही नहीं पाता
- B यह अपने-अपने सामर्थ्य पर ही निर्भर करता है
- C यह सबके लिए बहुत आसान है, कोई भी कर ले
- D यह केवल बचपन में ही संभव होता है, बाद में नहीं
Show answer
Why:
वे कोई नियम नहीं बनाते, ज़िम्मा व्यक्ति पर छोड़ देते हैं।
- A कि कथक कठिन होता है
- B कि नौकरी और कला, दोनों साथ निभ सकते हैं
- C कि लड़कियाँ कथक सीखती ही नहीं हैं, कभी नहीं
- D कि तालीम बहुत लंबी चलती है, कई-कई सालों तक
Show answer
Why:
वे आई.ए.एस. अफ़सर थीं और अच्छी नर्तकी भी।
- A कि यह किसी से भी ठीक से कभी नहीं हो पाता है
- B कि वह पहले नौकरी छोड़कर पूरा समय संगीत को दे
- C कि वह संगीत छोड़ दे
- D कि वह अपने सामर्थ्य को देखकर तय करे
Show answer
Why:
वे कोई नियम नहीं बनाते, ज़िम्मा व्यक्ति पर छोड़ देते हैं।
- A ग़लत, उन्होंने मेहनत करने का निश्चय किया
- B सही, उन्होंने तुरंत ही अपनी नौकरी छोड़ दी
- C सही, क्योंकि चाचा उनके गुरु थे
- D ग़लत, उन्होंने नृत्य छोड़ दिया
Show answer
Why:
उन्होंने तय किया कि महाराज बनना है तो मेहनत भी करनी होगी।
- A कला छोड़कर केवल काम करेंगे
- B अभ्यास कुछ महीनों के लिए पूरी तरह रोक ही देंगे
- C किसी से भेंट माँगेंगे
- D कठिनाई के बीच भी रोज़ का अभ्यास जारी रखेंगे
Show answer
Why:
अम्मा का नियम यही था कि कुछ मिले या न मिले, अभ्यास न रुके।
Important short questions (7)
पहले दौर में उनका परिवार छोटे नवाब कहलाता था और हवेली पर पहरा रहता था। दूसरे दौर में, बाबूजी के देहांत के बाद, आर्थिक परेशानियाँ बढ़ गईं।
कभी कर्ज़ लिया जाता था, कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचे जाते थे। कभी नृत्य के कार्यक्रमों से थोड़ा पैसा आ जाता था।
क्योंकि उसमें भोजन और अभ्यास को आपस में तौला गया है। भूख के सामने भी उन्होंने अभ्यास को भारी रखा, और इसी नियम से कला बची रही।
घर में कथक का माहौल था, इसलिए वे देख-देखकर सीख गए। वे नवाब के दरबार में नाचने भी लगे थे।
तालीम शुरू करते समय गुरु शिष्य को गंडा, यानी ताबीज़ बाँधते थे और बदले में शिष्य गुरु को भेंट देता था। यह दोनों के बीच का पवित्र रिश्ता माना जाता था।
क्योंकि अब वे भेंट देने की सामर्थ्य के बजाय शिष्य की लगन और समर्पण परखना चाहते थे। अपने बचपन की तंगी देखते हुए यह बदलाव और अर्थपूर्ण लगता है।
चाचा का डर था कि नौकरी में बँटकर भीतर का नर्तक पनप नहीं पाएगा। उन्होंने इसे मना नहीं किया, पर तय किया कि महाराज बनने के लिए मेहनत भी करेंगे।
Long answer questions (3)
उनके जीवन में दो बिलकुल अलग दौर आए। पहले दौर में घर में सुख-समृद्धि थी। वे लोग छोटे नवाब कहलाते थे और हवेली के दरवाज़े पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा रहता था। फिर बाबूजी का देहांत हुआ और सब बदल गया। आर्थिक परेशानियाँ बढ़ने लगीं और जिन डिब्बों में पहले कीमती हार रहते थे, वे खाली पड़ गए। गुजारे के लिए कर्ज़ लेना पड़ा और पुरानी साड़ियों के सोने-चाँदी के तार बेचने पड़े। दिन में भोजन मिलता तो रात को कई बार नहीं भी मिलता था। इतने पर भी उन्होंने शिकायत नहीं की, बल्कि इसे समय का चक्र कहा।
अम्मा की भूमिका सबसे बड़ी दिखती है, और वे दो जगह सामने आती हैं। पहली जगह संघर्ष के दिनों में है। बिरजू महाराज स्वयं कहते हैं कि उनकी सबसे बड़ी सहयोगी उनकी अम्मा थीं। उन्होंने कर्ज़ लेकर और साड़ियों के तार बेचकर घर चलाया। दूसरी जगह तालीम की है। बाबूजी ने भेंट मिलने पर ही गंडा बाँधने की शर्त रखी, और अम्मा ने बिरजू महाराज के ही दो कार्यक्रमों की कमाई भेंट के रूप में दे दी। सबसे बड़ी बात उनका नियम है, कि कुछ भी मिले या न मिले, अभ्यास ज़रूर करो। भूख के दिनों में भी अभ्यास इसी नियम से चलता रहा, इसलिए कहा जा सकता है कि कला अम्मा के कारण बची।
मुझे यह बदलाव बिलकुल ठीक लगता है। पहला कारण यह है कि पुरानी रस्म में भेंट पहले माँगी जाती थी, और इससे ग़रीब घर का योग्य बच्चा पीछे रह जाता। बिरजू महाराज के साथ भी यही कठिनाई आई थी, और अम्मा ने जैसे-तैसे भेंट जुटाई थी। दूसरा कारण यह है कि नई रस्म में शिष्य की लगन परखी जाती है, और कला में लगन ही सबसे ज़रूरी चीज़ है। तीसरा कारण यह है कि कई वर्षों सिखाने के बाद गुरु शिष्य को ठीक-ठीक जान लेते हैं, इसलिए तब बँधा रिश्ता अधिक सच्चा होता है। मेरे विचार से इस बदलाव से रस्म का मान घटा नहीं, बढ़ा है।
Flashcards (17)
Play this topic
- जीवन क्रम में लगाइए
- शब्द और अर्थ
- किस दौर की बात
- सही या भ्रम
- झटपट उत्तर
कथक की परंपरा और लय
कथक की परंपरा बहुत पुरानी है और पहले वह मंदिरों में कथा कहने का ढंग था। लखनऊ, जयपुर और बनारस घराने इसी से विकसित हुए। बिरजू महाराज बताते हैं कि लय हर काम में संतुलन बनाए रखती है, और लोक नृत्य तथा शास्त्रीय नृत्य में क्या अंतर है।
What you will be able to do
- मैं कथक की पुरानी परंपरा के बारे में बता सकता/सकती हूँ।
- मैं हरिया गाँव और बैरगिया नाले की कथा सुना सकता/सकती हूँ।
- मैं लय का महत्त्व घसियारे के उदाहरण से समझा सकता/सकती हूँ।
- मैं लोक नृत्य और शास्त्रीय नृत्य के तीन अंतर बता सकता/सकती हूँ।
- मैं शास्त्रीय नृत्य की प्रमुख शैलियों के नाम बता सकता/सकती हूँ।
Key points
कथक की चर्चा महाभारत के आदिपर्व और रामायण में भी मिलती है।
पहले यह कथा कहने का रोचक और अनौपचारिक ढंग था, जो मंदिरों तक सीमित था।
लखनऊ घराने के लोग मूलतः हरिया गाँव के रहने वाले थे।
उस गाँव में 989 कथिकों के घर हुआ करते थे।
बैरगिया नाले की कथा में नौ कथिकों ने तीन डाकुओं को कला से बाँध लिया था।
लखनऊ के बाद जयपुर और फिर बनारस घराने का विकास हुआ।
संगीत में तीनों आते हैं, गाना भी, बजाना भी और नाचना भी।
लय हर काम में, नृत्य में और जीवन में संतुलन बनाए रखती है।
लोक नृत्य सामूहिक होता है, जबकि शास्त्रीय नृत्य में एक नर्तक अकेला ही काफ़ी है।
Full explanation
परंपरा कितनी पुरानी
माणिक का प्रश्न यह है कि कथक कब से चला आ रहा है। बिरजू महाराज बताते हैं कि यह परंपरा बहुत पुरानी है। महाभारत के आदिपर्व और रामायण, दोनों में इसकी चर्चा मिलती है। यानी यह नृत्य किसी एक व्यक्ति ने नहीं बनाया, वह धीरे-धीरे बना।
पहले यह कथा कहना था
शुरू में कथक नाच नहीं, कथा कहने का ढंग था। वह रोचक था और अनौपचारिक भी, यानी उसके नियम बँधे नहीं थे। तब यह मंदिरों तक ही सीमित था। कथा कहने वाले को कथिक कहा जाता था, और इसी शब्द से नृत्य का नाम बना।
हरिया गाँव
उनके लखनऊ घराने के लोग मूलतः एक गाँव के रहने वाले थे, जो बनारस और इलाहाबाद के बीच पड़ता है। उस गाँव को हरिया कहते हैं। वहाँ 989 कथिकों के घर हुआ करते थे। यह संख्या बताती है कि यह कला किसी एक परिवार की नहीं, पूरे गाँव की थी। कथिकों का एक तालाब आज भी वहाँ मौजूद है।
बैरगिया नाले की कथा
उस गाँव में एक नाला है, जिसका नाम बैरगिया है। उसके साथ एक कथा जुड़ी है। एक बार नौ कथिक उस नाले के पास से गुजर रहे थे। उसी समय वहाँ तीन डाकू आ धमके। कुछ कथिक डर गए, यह बात कथा छिपाती नहीं।
कला का दम
आगे जो हुआ, वही इस कथा की जान है। उन कथिकों के कथक में ऐसी ताक़त थी कि डाकू अपनी सारी नीयत भूलकर देखने में ही खो गए। यानी लूटने आए लोग दर्शक बन गए। इसी घटना से एक पद बना, जो लोगों में चल पड़ा और आज भी सुनाई देता है।
पद का भाव
उस पद में कहा गया है कि नौ कथिक तीन चोरों को नचा देते हैं। आगे तबले की बोली की बात आती है और हिसाब बताया जाता है कि एक-एक पर तीन-तीन पड़ते हैं। पद हल्का-फुल्का है, पर उसमें गर्व छिपा है।
तीन घराने
लखनऊ घराने के बाद जयपुर घराने का विकास हुआ और फिर बनारस घराने का। इनके अलावा रायगढ़ के महाराज चक्रधर की अपनी एक निराली शैली रही। इससे समझ आता है कि एक ही नृत्य के भीतर कई धाराएँ बन सकती हैं।
संगीत और नृत्य
श्रेया पूछती हैं कि नृत्य सीखने के लिए संगीत जानना ज़रूरी है या नहीं। उनका उत्तर यह है कि गाना, बजाना तथा नाचना, ये तीनों संगीत का ही हिस्सा हैं। संगीत में लय होती है, और उसकी समझ चाहिए ही। नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या, तीनों साधन बनते हैं।
अदृश्य शक्ति को निमंत्रण
वे नृत्य को एक निमंत्रण कहते हैं। उनके लिए नाचना एक तरह से अदृश्य शक्ति को बुलाना है, कि वह भीतर समा जाए और नाचे। यह बात नृत्य को केवल शरीर का काम नहीं रहने देती, वह उसे ध्यान जैसा बना देती है।
घसियारे का उदाहरण
लय केवल नृत्य की चीज़ नहीं है, यह समझाने के लिए वे एक बहुत सीधा उदाहरण देते हैं। घास काटने वाला पहले घास को मुट्ठी में थाम लेता है। फिर उस पर हँसिया चलाता है और उसके बाद कटी घास एक ओर सरका देता है। इन दोनों हरकतों का क्रम ज़रा भी आगे-पीछे हुआ, तो हँसिया उसके हाथ पर बैठ जाएगा।
उदाहरण का अर्थ
यह उदाहरण डराने के लिए नहीं है। वे यह दिखाते हैं कि लय हर काम में, नृत्य में और जीवन में संतुलन बनाए रखती है। जहाँ दो काम बारी-बारी से होते हैं, वहाँ लय ही सुरक्षा है। इसीलिए वे कहते हैं कि इसका ज्ञान हर किसी के काम आता है।
लय एक आवरण है
वे लय को एक आवरण भी कहते हैं, यानी ऊपर से ढकने वाली चादर। यही आवरण नृत्य को सुंदरता देता है। आगे वे एक व्यावहारिक बात जोड़ते हैं। जिस नर्तक को सुर-ताल की समझ है, वह तुरंत जान जाएगा कि लहरा ठीक नहीं है। समझ न हो, तो नृत्य अंगों में उतरता ही नहीं।
लोक और शास्त्रीय नृत्य
माणिक पूछते हैं कि शास्त्रीय और लोक नृत्य में क्या अंतर है। वे बताते हैं कि लोक नृत्य सामूहिक होता है। दिन भर काम करने के बाद लोग थकान उतारने और मन बहलाने के लिए जुटकर नाच लेते हैं। यानी वह नाचने वाले अपने ही आनंद और तृप्ति के लिए करते हैं। शास्त्रीय नृत्य में दूसरी ओर नर्तक अकेला ही काफ़ी होता है। वह दर्शकों के लिए होता है, न कि केवल अपने मन-बहलाव के लिए। एक रोचक बात वे जोड़ते हैं, कि शुरू में कथावाचक भी लोक नर्तक ही हुआ करता था। धीरे-धीरे जब उसकी शैली और रूप निश्चित होते गए, तब वह शास्त्रीय नृत्य बन गया।
आज की स्थिति
श्रेया पूछती हैं कि देश में शास्त्रीय नृत्य की स्थिति कैसी है। वे कहते हैं कि कुछ वर्ष पहले तक स्थिति दयनीय थी, पर अब लोकप्रियता बढ़ रही है। साथ ही शोर वाले संगीत-नृत्य का भी ख़ूब प्रचलन है। उनका संदेश संतुलित है, कि वह संगीत भी सुनो और देखो, पर अपनी परंपरा की गहराई को भी समझो।
शैलियों के नाम
तनुश्री पूछती हैं कि दक्षिण और उत्तर के नृत्य में अंतर है या नहीं। वे पहले नाम गिनाते हैं, यानी कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी और मणिपुरी। इनमें गाने और बजाने के ढंग का अंतर अपनी जगह है, पर हर नृत्य की अपनी लय और भाव-भंगिमा भी है।
भंगिमाओं का स्रोत
वे दो नृत्यों की तुलना करके बात साफ़ करते हैं। कथक अपनी भंगिमाएँ रोज़ के जीवन से उठाता है, और भरतनाट्यम उन्हें मूर्तियों से लेता है। भरतनाट्यम दोनों भाव एक साथ दिखा देता है, जबकि कथक उन्हें एक के बाद एक रखता है।
कोमलता और ओज
वे एक और तुलना रखते हैं। ओडिसी और मणिपुरी में कोमलता है, जबकि कथकली में ओज, यानी तेज़ी और शक्ति। कथक में ये दोनों ही मिलते हैं। इसी से पता चलता है कि हर शैली की अपनी एक पहचान होती है।
कथक की नाज़ुकी
अंत में वे कथक की नाज़ुकी बताते हैं। उसमें गर्दन बहुत हल्के से हिलाई जाती है, जैसे चिराग की लौ काँपती है। उँगलियाँ भी बहुत धीरे हिलती हैं, जैसे घूँघट पकड़ने या उठाने में। उँगलियाँ ज़रा ज़ोर से हिलते ही चाचा जी टोक देते थे कि घूँघट उठा रहे हो या तंबू।
Concepts and terms
कथा कहने वाला कलाकार। शुरू में कथक इसी तरह कथा कहने का ढंग था, और इसी शब्द से नृत्य का नाम कथक बना।
कलाकारों का वह कुटुंब, जिसमें नृत्य और संगीत की अपनी एक ही शैली चलती आई हो। उस शैली के सिद्धांत पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रशिक्षण से आगे बढ़ते हैं।
किसी काम में समय का सधा हुआ क्रम। बिरजू महाराज के अनुसार यह केवल संगीत की चीज़ नहीं है, वह हर काम और पूरे जीवन में संतुलन बनाए रखती है।
नृत्य के साथ बजने वाली धुन, जो ताल को बार-बार दोहराती है। सुर-ताल की समझ रखने वाला नर्तक तुरंत पकड़ लेता है कि लहरा ठीक नहीं है।
शरीर और चेहरे से भाव दिखाने का ढंग। कथक अपनी भाव-भंगिमा रोज़ के जीवन से उठाता है, जबकि भरतनाट्यम उसे मूर्तियों से लेता है।
यहाँ ध्यान रखिए
आम भ्रम
एक छोटा प्रसंग
Scenario:
किसी विद्यालय में वार्षिक कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी। कक्षा सात के बच्चों ने दो प्रस्तुतियाँ चुनीं। पहली में बीस बच्चे मिलकर अपने क्षेत्र का फ़सल कटाई वाला नृत्य करने वाले थे, जिसे वे घर-मोहल्ले में देखकर ही सीखे थे। उसमें सब एक जैसी चाल चलते और कोई ख़ास नियम नहीं था। दूसरी प्रस्तुति में अकेली सलोनी थी, जो तीन साल से कथक सीख रही है। उसने अपने गुरु से पूछकर एक बँधी रचना चुनी और उसके लिए तबले वाले भैया को बुलाया। अभ्यास के दौरान एक दिन तबला थोड़ा आगे-पीछे बजने लगा, और सलोनी ने तुरंत रोककर कहा कि आज कुछ ठीक नहीं बज रहा।
Analysis:
ये दोनों प्रस्तुतियाँ ठीक वही अंतर दिखाती हैं जो बिरजू महाराज बताते हैं। पहली प्रस्तुति लोक नृत्य जैसी है, क्योंकि वह सामूहिक है, देखकर सीखी गई है और उसके नियम खुले हैं। दूसरी शास्त्रीय नृत्य जैसी है, क्योंकि उसमें एक नर्तकी अकेली काफ़ी है, रचना बँधी है और वह दर्शकों के लिए तैयार की गई है। सलोनी का तबला रोक देना भी पाठ की एक बात को दोहराता है। जिस नर्तक को सुर-ताल की समझ होती है, वही पकड़ पाता है कि साथ बजने वाली धुन ठीक नहीं है। यहाँ यह भी दिखता है कि दोनों में कोई छोटा-बड़ा नहीं है, दोनों का उद्देश्य अलग है।
Activity:
अपने क्षेत्र का कोई एक लोक नृत्य चुनिए। कॉपी में दो खाने बनाकर लिखिए कि उसमें लोक नृत्य की कौन-सी बातें हैं और कौन-सी बातें शास्त्रीय नृत्य से मिलती हैं।
लय पहचानिए
Title:
लय पहचानिए
Safety:
ताल देने के लिए पेंसिल या स्केल से मेज़ न पीटिए, हथेली का ही प्रयोग कीजिए।
What You Notice:
आप देखेंगे कि ताल बदलते ही चलने वाले का कदम लड़खड़ा जाता है। यही बात घसियारे के उदाहरण में है, जहाँ मारने और हटाने का क्रम बिगड़ने पर चोट लग सकती है।
Did you know
हरिया गाँव में कथिकों का एक तालाब आज भी मौजूद है।
रायगढ़ के महाराज चक्रधर की भी अपनी एक अलग शैली थी।
कथक में गर्दन इतनी हल्के से हिलाई जाती है, जैसे चिराग की लौ काँपती है।
Memory tricks
तीन घराने क्रम से — लखनऊ, फिर जयपुर, फिर बनारस।
लोक और शास्त्रीय — लोक सबके साथ और अपने लिए, शास्त्रीय अकेले और दर्शकों के लिए।
Practice MCQs with answers (25)
- A महाभारत
- B रामचरितमानस
- C पंचतंत्र
- D हितोपदेश
Show answer
Why:
रामायण में भी इसकी चर्चा मिलती है।
- A तब उसमें कोई लय नहीं होती थी
- B तब उसके नियम बँधे हुए नहीं थे
- C तब उसे कोई देखने नहीं आता था
- D तब उसमें तबला नहीं बजता था
Show answer
Why:
वह अनौपचारिक था और मंदिरों तक सीमित था।
- A जिसके नियम बहुत कड़े हों
- B जो बहुत महँगा हो
- C जिसके नियम बँधे न हों
- D जो बहुत पुराना हो
Show answer
Why:
शुरू में कथक के नियम इसी तरह खुले हुए थे।
- A कथावाचक
- B घराना
- C लहरा
- D कथिक
Show answer
Why:
कथिक यानी कथा कहने वाला कलाकार।
- A बनारस और इलाहाबाद के बीच बसे हरिया गाँव के
- B रायगढ़ के पास बसे किसी बहुत पुराने कस्बे के भीतर
- C जयपुर के एक मोहल्ले के
- D लखनऊ शहर के ही किसी पुराने मोहल्ले के भीतर ही
Show answer
Why:
वहाँ कथिकों का एक तालाब आज भी मौजूद है।
- A नौ सौ से भी कुछ अधिक, यानी 989
- B ठीक सौ घर, न एक कम और न एक ज़्यादा
- C लगभग पचास घर, आधे गाँव में फैले हुए थे
- D ठीक नौ घर, गाँव के एक ही कोने में बसे
Show answer
Why:
यह संख्या बताती है कि कला पूरे गाँव की थी।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
तीनों कथन सही हैं। घरों की इतनी बड़ी संख्या ही बताती है कि कथक पूरे गाँव का काम था, किसी एक घर का नहीं।
- A तीन
- B दो
- C चार
- D पाँच
Show answer
Why:
वहीं नाले के पास तीन डाकू आ पहुँचे थे।
- A वे कथिकों को लूटकर नाले के रास्ते भाग गए
- B वे सब कुछ भूलकर कथक में मग्न हो गए
- C वे डरकर लौट गए
- D वे कथिकों के साथ बैठकर कथक सीखने लगे
Show answer
Why:
यानी लूटने आए लोग दर्शक बन गए।
- A कथा कमज़ोर पड़ जाती है
- B कथा का अर्थ बदल जाता है
- C कथा अधिक सच्ची लगती है
- D कथा का अंत बदल जाता है
Show answer
Why:
डर छिपाने के बजाय मानने से कला का दम और उभरकर आता है।
- A ग़लत, उससे पहले जयपुर घराने का विकास हुआ था
- B सही, बनारस दूसरा घराना था
- C सही, क्योंकि बनारस लखनऊ के बहुत पास ही पड़ता है
- D ग़लत, बनारस घराना तो कभी बना ही नहीं था, ऐसा नहीं है
Show answer
Why:
क्रम लखनऊ, जयपुर और फिर बनारस का है।
- A महाराज चक्रधर
- B महाराज शंभू
- C महाराज अच्छन
- D महाराज लच्छू
Show answer
Why:
तीन घरानों के अलावा यह एक और धारा थी।
- A कोई बड़ा मकान
- B किसी नगर का कोई बहुत पुराना मोहल्ला, जहाँ लोग रहते हैं
- C किसी गाँव के किसी बड़े और पुराने परिवार का नाम
- D एक शैली साझा करने वाले कलाकारों का समुदाय
Show answer
Why:
उस शैली के सिद्धांत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।
- A कि तीनों को एक साथ सीखना हर कलाकार के लिए अनिवार्य है
- B कि नृत्य सबसे कठिन है
- C कि नृत्य सीखने वाले को भी संगीत का ज्ञान चाहिए
- D कि संगीत के बिना भी नृत्य का सारा काम चल ही जाता है
Show answer
Why:
संगीत में लय होती है, और उसी लय पर नृत्य टिका रहता है।
- A केवल शरीर के व्यायाम और ताक़त का
- B केवल मनोरंजन और मन बहलाने का साधन
- C शरीर, ध्यान और तपस्या का
- D केवल कमाई का
Show answer
Why:
इसी से नृत्य केवल शरीर का काम नहीं रह जाता।
- A घास को गट्ठर में बाँधना और उसे उठाना
- B घास पर हँसिया मारना और घास हटाना
- C घास सुखाना और उसे समेटकर गट्ठर बाँधना
- D घास गिनना और बेचना
Show answer
Why:
इसी बारी-बारी के क्रम में लय बनी रहती है।
- A घास बरबाद हो जाएगी
- B हँसिया टूट जाएगा
- C समय अधिक लगेगा
- D उसका हाथ कट जाएगा
Show answer
Why:
इसीलिए वे लय को जीवन की सुरक्षा से जोड़ देते हैं।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है। उदाहरण खेती के बारे में नहीं, लय के बारे में है, जो हँसिया चलाने में भी चाहिए।
- A कि वह नृत्य को छिपा देती है
- B कि वह ढकने वाली चादर की तरह नृत्य को सुंदरता देती है
- C कि वह नृत्य को कठिन और उलझा हुआ बना देती है, आसान नहीं
- D कि वह नृत्य के बाद आती है
Show answer
Why:
सुंदरता ऊपर से दिखती है, पर आती लय से है।
- A कि मंच छोटा है
- B कि दर्शक कम हैं
- C कि लहरा ठीक नहीं है
- D कि पोशाक ठीक नहीं है
Show answer
Why:
लहरा नृत्य के साथ बजने वाली धुन होती है।
- A शास्त्रीय नृत्य
- B लोक नृत्य
- C कोई घराना
- D मंदिर की कथा
Show answer
Why:
लोक नृत्य सामूहिक होता है और नाचने वालों के अपने मन-बहलाव के लिए।
- A दोनों दर्शकों के लिए
- B दोनों नाचने वालों के लिए
- C लोक दर्शकों के लिए, और शास्त्रीय केवल अपने मन के लिए
- D लोक अपने मन-बहलाव के लिए, शास्त्रीय दर्शकों के लिए
Show answer
Why:
यही दोनों के बीच का सबसे बड़ा अंतर है।
- A किसी दरबार में जाकर
- B किसी घराने में शामिल होकर
- C जब उसकी शैली और रूप निश्चित होते गए
- D जब वह मंदिर छोड़कर खुले मंच पर आ गया
Show answer
Why:
शुरू में वह लोक नर्तक ही हुआ करता था।
- A कि उसे सुनना-देखना पूरी तरह छोड़ दो, कभी उसके पास न जाओ
- B कि उसे सुनो-देखो, पर अपनी परंपरा की गहराई भी समझो
- C कि उसे ही सबसे अच्छा संगीत मानकर चलो, और परंपरा छोड़ दो
- D कि उस पर कोई राय न बनाओ
Show answer
Why:
उनका संदेश मनाही का नहीं, संतुलन का है।
- A कथक की मूर्तिकला से और भरतनाट्यम की दैनिक जीवन से
- B दोनों की मूर्तिकला से
- C दोनों की दैनिक जीवन से
- D कथक की दैनिक जीवन से और भरतनाट्यम की मूर्तिकला से
Show answer
Why:
कथक दोनों भाव एक के बाद एक रखता है, और भरतनाट्यम उन्हें साथ-साथ दिखाता है।
Important short questions (7)
महाभारत के आदिपर्व और रामायण, दोनों में इसकी चर्चा मिलती है। इसी से पता चलता है कि यह नृत्य बहुत पुराना है।
शुरू में वह कथा कहने का रोचक और अनौपचारिक ढंग था, जिसके नियम बँधे नहीं थे। तब वह मंदिरों तक सीमित था, जबकि आज वह मंच का शास्त्रीय नृत्य है।
एक बार नौ कथिक उस नाले के पास से गुजर रहे थे और वहाँ तीन डाकू आ पहुँचे। कुछ कथिक डर गए, पर कला में ऐसी ताक़त थी कि डाकू अपना काम भूलकर उस नृत्य में डूब गए।
वह एक हाथ से घास थामता है, हँसिया चलाता है, और कटी घास अलग सरका देता है। इस बारी-बारी के क्रम में ज़रा भी गड़बड़ी हुई तो उसका हाथ कट जाएगा, इसलिए लय ही उसकी सुरक्षा है।
लोक नृत्य सामूहिक होता है, शास्त्रीय में एक नर्तक अकेला काफ़ी है। लोक नाचने वालों के मन-बहलाव के लिए होता है, शास्त्रीय दर्शकों के लिए। लोक में शैली खुली रहती है, शास्त्रीय में वह निश्चित होती है।
कुछ वर्ष पहले तक स्थिति दयनीय थी, पर अब लोकप्रियता बढ़ रही है। साथ ही शोर वाले संगीत-नृत्य का भी ख़ूब प्रचलन है।
ओडिसी में कोमलता है और कथकली में ओज, यानी तेज़ी और शक्ति। कथक में ये दोनों ही मिलते हैं।
Long answer questions (3)
शुरू में कथक नाच नहीं था। वह कथा कहने का रोचक और अनौपचारिक ढंग था, और तब वह मंदिरों तक सीमित था। कथा कहने वाले को कथिक कहा जाता था, और इसी शब्द से नृत्य का नाम बना। धीरे-धीरे कथावाचक की शैली और रूप निश्चित होते गए, और तब वह शास्त्रीय नृत्य बन गया। इसी बीच घरानों का विकास हुआ। पहले लखनऊ घराना बना, फिर जयपुर और फिर बनारस। रायगढ़ के महाराज चक्रधर की अपनी एक निराली शैली रही। इस तरह एक खुली परंपरा धीरे-धीरे निश्चित नियमों वाली कला बन गई।
वे कहते हैं कि लय हमारी हर गतिविधि में होती है, केवल नृत्य या संगीत में नहीं। इसे समझाने के लिए वे घास काटने वाले का उदाहरण देते हैं। वह घास मुट्ठी में थामता है, उस पर हँसिया चलाता है और कटी घास सरका देता है। इन तीनों हरकतों का क्रम बिगड़ते ही हँसिया उसके हाथ पर पड़ सकता है। यानी वहाँ लय सुंदरता की बात नहीं, सुरक्षा की बात है। इसी से वे आगे कहते हैं कि लय हर काम में, नृत्य में और जीवन में संतुलन बनाए रखती है। नृत्य में वे उसे आवरण भी कहते हैं, जो ऊपर से ढककर उसे सुंदरता देता है।
पाठ में सात शैलियाँ गिनाई गई हैं, यानी भरतनाट्यम और कथकली, मोहिनीअट्टम और कुचिपुड़ी, ओडिसी और मणिपुरी, तथा कथक। इनमें गाने और बजाने के ढंग का अंतर अपनी जगह है, पर हर नृत्य की अपनी लय और भाव-भंगिमा भी होती है। कथक अपनी भाव-भंगिमा रोज़ के जीवन से उठाता है और भरतनाट्यम मूर्तियों से। भरतनाट्यम दोनों भाव एक साथ बरतता है, और कथक उन्हें बारी-बारी लेता है। स्वभाव का अंतर भी है। मणिपुरी और ओडिसी कोमल पड़ते हैं, कथकली में ओज रहता है, और कथक में ये दोनों ही मिलते हैं। इसी से पता चलता है कि एक ही देश में कला कितने रूप ले सकती है।
Flashcards (17)
Play this topic
- कथक का सफ़र क्रम में
- शब्द और अर्थ
- लोक या शास्त्रीय
- सही या भ्रम
- झटपट उत्तर
बदलाव, शौक़ और संदेश
बिरजू महाराज ने पुरानी परंपरा कायम रखकर प्रस्तुतीकरण बदला। वे परंपरा को वृक्ष कहते हैं, जो सबको एक जैसी छाया देता है। वे मशीनें खोलकर देखते हैं, रात में चित्र बनाते हैं, और सबसे कहते हैं कि हुनर ऐसा खज़ाना है जिसे कोई छीन नहीं सकता।
What you will be able to do
- मैं बता सकता/सकती हूँ कि उन्होंने कथक में कौन-से बदलाव किए।
- मैं परंपरा के वृक्ष वाले उदाहरण को समझा सकता/सकती हूँ।
- मैं पहले और अब की प्रस्तुति के तीन अंतर बता सकता/सकती हूँ।
- मैं उनके शौक़ और जिज्ञासा के उदाहरण दे सकता/सकती हूँ।
- मैं हुनर और लय पर उनका संदेश अपने शब्दों में लिख सकता/सकती हूँ।
Key points
उन्होंने कथक की पुरानी परंपरा कायम रखी और प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए।
बाबूजी और चाचा लोगों के खड़े होने के अंदाज़ को भी उन्होंने कथक में शामिल किया।
उन्होंने तीनों की शिक्षा इकट्ठा करके एक नया रूप तैयार किया।
टैगोर और त्यागराज जैसे कवियों की रचनाओं पर भी उन्होंने कथक रचनाएँ बनाईं।
उनका मानना है कि भाषाएँ अलग होती हैं, पर इंसान सब जगह एक-से होते हैं।
वे परंपरा को वृक्ष कहते हैं, जो सबको एक जैसी छाया और आश्रय देता है।
पहले मंच नहीं होते थे, फ़र्श पर चाँदनी बिछी रहती थी और दर्शक चारों ओर बैठते थे।
मशीनें खोलकर देखने की जिज्ञासा से वे ब्रीफ़केस में पेचकस रखते थे।
उनके अनुसार हुनर ऐसा खज़ाना है, जिसे कोई छीन नहीं सकता।
Full explanation
परंपरा वही, ढंग नया
तनुश्री का प्रश्न है कि कथक में उन्होंने अपनी ओर से कुछ नया रखा या नहीं। उनका उत्तर दो हिस्सों में है। पहला यह कि उन्होंने पुरानी परंपरा को कायम रखा है। दूसरा यह कि उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं। यानी भीतर की चीज़ वही है, उसे सामने रखने का ढंग बदला है।
खड़े होने का अंदाज़
उन्होंने एक दिलचस्प बात पर ध्यान दिया। उनके चाचा लोग और बाबूजी नाचते तो ख़ूबसूरत थे ही, पर उनके खड़े होने का अंदाज़ भी निराला होता था। यह कोई सिखाई गई मुद्रा नहीं थी। वही अंदाज़ उन्होंने आगे चलकर अपने कथक में भी जोड़ लिया।
तीन शिक्षाओं से एक रूप
बाबूजी और दोनों चाचा उनके लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे थे, यानी सबसे बड़े। उन्होंने तीनों की शिक्षा इकट्ठा करके एक नया रूप तैयार किया। यह बदलाव नक़ल नहीं था। यह तीन धाराओं को मिलाकर एक नई धारा बनाना था।
नए कवियों की रचनाएँ
उन्होंने टैगोर और त्यागराज जैसे कवियों की रचनाओं पर भी कथक रचनाएँ तैयार कीं। तनुश्री यहाँ एक अच्छा प्रश्न उठाती हैं, कि ये लोग तो भिन्न-भिन्न भाषाओं के कवि थे। इसी प्रश्न से पाठ का सबसे गहरा उत्तर निकलता है।
इंसान सब जगह एक-से
वे कहते हैं कि बोली बदल जाती है, पर आदमी हर जगह एक ही जैसा रहता है। वे एक सच्चा प्रसंग सुनाते हैं। फ्रांस में एक दर्शक ने कहा कि वह यशोदा को नहीं जानता। उन्होंने उत्तर दिया कि हर माँ यशोदा ही है और हर छोटा बच्चा कृष्ण।
बच्चे की ज़िद
वे इसे आगे खोलते हैं। बच्चे की ज़िद, रोना, उठना और बैठना, सब जगह एक जैसा होता है। अंतर बाद में आता है, क्योंकि धीरे-धीरे हमें अलग भाषा, अलग संस्कार और तौर-तरीके मिलते हैं। यानी नींव सबकी एक है, ऊपर का रूप अलग-अलग बनता है।
परंपरा एक वृक्ष है
अब वे एक सुंदर उदाहरण रखते हैं। वे कहते हैं कि परंपरा किसी वृक्ष जैसी होती है। उसकी छाया और शरण सबके लिए बराबर रहती है। पर उसकी जड़ के पास बैठने वाले लोगों के स्वभाव एक जैसे नहीं होते। छाया एक है, बैठने वाले अनेक।
बीज और नया वृक्ष
उदाहरण का दूसरा हिस्सा और गहरा है। उसी वृक्ष का बीज कहीं बो दें, तो आगे चलकर एक और वृक्ष फलेगा। पर उस नए पेड़ का रूप पहले जैसा ही नहीं होगा। वह इसी से तय होगा कि उसे कैसी हवा मिली, कितना पानी मिला और कौन-सी खाद मिली। यानी परंपरा आगे बढ़ती है, पर हर बार कुछ बदलकर।
पहले मंच नहीं थे
माणिक पूछते हैं कि उनके सीखने के समय से अब तक क्या बदला है। वे बताते हैं कि पहले मंच नहीं होते थे। फ़र्श पर चाँदनी बिछी होती थी, यानी बिछाने की बड़ी सफ़ेद चादर, और उस पर कथक होता था। दर्शक चारों ओर बैठते थे, न कि केवल सामने।
शृंगार का सामान
शृंगार का सामान भी आज जैसा नहीं था। चेहरे के लिए चंदनलेप लगाया जाता था और होंठ रंगने के लिए पान का उपयोग होता था। इन छोटे ब्योरों से पता चलता है कि कला उस समय के साधनों के साथ चलती थी।
पहले पूरा वर्णन
सबसे बड़ा बदलाव प्रस्तुति के ढंग में आया। पुराने नर्तक हर दृश्य को इतना खोलकर बताते थे कि देखने वाले की आँखों में वह तस्वीर अपने आप बन जाती थी। जैसे कि गोपियाँ घड़ा लेकर धीरे-धीरे पानी भरने चलीं, और पीछे से आकर कृष्ण उन पर कंकड़ मार गए।
अब कल्पना पर छोड़ा
अब ढंग उलट गया है। नर्तक केवल इतना कहता है कि पनघट की गत देखो, और बाक़ी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि कला घट गई। इसका अर्थ है कि अब दर्शक से भी भागीदारी की आशा की जाती है।
छुटपन की लय
श्रेया पूछती हैं कि उन्होंने गाना, बजाना और नाचना कब शुरू किया। वे बताते हैं कि बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने तबला बजाना शुरू कर दिया था। तब चाचा ने कह दिया था कि इस लड़के के हाथ में लय बैठी है। पाँच साल का होते-होते वे हारमोनियम पर लहरा बजाने लगे।
सुरैया का गाना
वे एक मज़ेदार किस्सा भी सुनाते हैं। सबको ख़ुश करने के लिए वे फ़िल्मी गाने ख़ूब गाते थे। एक बार सबकी फ़रमाइश पर वे सुरैया के एक गाने पर देर तक नाचे। बहनों ने उन्हें बिंदी और चुन्नी से सजा दिया था। तभी चाचा आ गए, और डर के मारे वे सब कुछ उतार फेंककर छिप गए।
मशीनों से लगाव
माणिक पूछते हैं कि ख़ाली समय में वे क्या करते हैं। उनका उत्तर है कि वे ख़ाली होते ही नहीं, नींद में भी हाथ चलता ही रहता है। मशीनों में उनका मन ख़ूब लगता है। वे कहते हैं कि नर्तक न होते तो शायद इंजीनियर होते। कोई भी मशीन खोलकर उसके कल-पुर्ज़े देखने की जिज्ञासा उन्हें रहती है, इसलिए वे ब्रीफ़केस में हरदम पेचकस और छोटे औज़ार रखते हैं। उन्होंने कभी अपना पंखा और फ्रिज तक ठीक किया। बेटी और दामाद चित्रकार हैं, इसलिए उन्हें भी पेंटिंग का शौक़ लग गया। प्रायः रात बारह बजे के बाद वे चित्र बनाने बैठते हैं, और दो वर्षों में लगभग सत्तर चित्र बना चुके थे।
माँ-बाप से विनती
श्रेया पूछती हैं कि बच्चा कला सीखना चाहे और घरवाले न चाहें तो क्या करना चाहिए। उनकी विनती यह है कि बच्चे का मन लगे तो उसे लय से खेलने की छूट दी जाए। वे कहते हैं कि बाक़ी खेलों की तरह यह भी एक खेल ही है, और इसमें सीखने को बहुत कुछ मिल जाता है। संतुलन, समय का अंदाज़ा और उसका सदुपयोग, ये सब बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
लड़कियाँ और हुनर
तनुश्री पूछती हैं कि उनके परिवार में लड़कियों ने कथक सीखा या नहीं। वे साफ़ बताते हैं कि उनकी बहनों को कथक नहीं सिखाया गया, पर अपनी बेटियों को उन्होंने ख़ूब सिखाया। उनका कहना है कि हर लड़की के पास पढ़ाई हो या कोई कौशल, कुछ ज़रूर होना चाहिए। तभी वह अपने पैरों पर खड़ी रह सकती है। कौशल एक ऐसा खज़ाना है, जिस पर किसी और का हाथ नहीं पड़ सकता।
अंतिम संदेश
अंत में वे बच्चों से सीधे कहते हैं कि संगीत ज़रूर सीखो, क्योंकि मन की शांति के लिए यह बहुत ज़रूरी है। लय हमें अनुशासन और संतुलन सिखाती है। नाचने वाला, गाने वाला और बजाने वाला, तीनों अपनी-अपनी बात मिलाकर चलते हैं और तभी कोई नई चीज़ खड़ी होती है। इसी से यह सीख मिलती है कि साथी बनकर चलने पर अपना लक्ष्य भी पास आ जाता है।
Concepts and terms
किसी कला को दर्शकों के सामने रखने का ढंग। उन्होंने परंपरा नहीं बदली, केवल उसे सामने रखने का ढंग बदला, और यही अंतर समझने योग्य है।
बिछाने की बड़ी सफ़ेद चादर। उन दिनों मंच नहीं बनता था। फ़र्श पर सफ़ेद चाँदनी बिछती, नर्तक उसी पर नाचता, और सुनने वाले उसके चारों ओर बैठ जाते।
कथक में किसी दृश्य या चाल को दिखाने वाला छोटा टुकड़ा। पहले पूरा दृश्य बोलकर बताया जाता था, अब केवल गत का नाम कहकर बाक़ी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।
कोई सीखा हुआ कौशल। उनके अनुसार यह ऐसा खज़ाना है जिसे कोई छीन नहीं सकता, और वक़्त पड़ने पर वही काम आता है।
हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक, जो कान में सोने अथवा चाँदी का तार डालने से जुड़ा है। यह शब्द इसी पाठ की शब्द-सूची में आया है।
यहाँ ध्यान रखिए
आम भ्रम
एक छोटा प्रसंग
Scenario:
एक मोहल्ले में हर साल रामलीला होती थी। पहले वह खुले मैदान में होती, जहाँ ज़मीन पर दरी बिछा दी जाती और लोग चारों ओर बैठते। कलाकार हर दृश्य को विस्तार से बोलकर बताते, और एक दृश्य में पंद्रह मिनट लग जाते। इस साल मोहल्ले की समिति ने एक ऊँचा मंच बनवाया, पीछे पर्दे लगाए और रोशनी की व्यवस्था की। कलाकारों ने तय किया कि लंबे वर्णन घटा दिए जाएँगे और कुछ दृश्य केवल संकेत से दिखाए जाएँगे। कुछ बड़े-बूढ़े नाराज़ हुए कि पुरानी रामलीला ख़त्म हो गई। एक बुज़ुर्ग ने कहा कि कथा वही है, कहने का ढंग बदला है, और यह नाराज़ होने की बात नहीं।
Analysis:
इस प्रसंग में साक्षात्कार के तीनों बदलाव एक साथ दिखते हैं। पहला, मंच न होने से मंच होने तक का बदलाव, जो कथक में भी ठीक इसी तरह आया। दूसरा, दर्शकों का चारों ओर बैठने से सामने बैठने तक आना। तीसरा, विस्तृत वर्णन से संकेत तक का बदलाव, यानी बाक़ी दर्शक की कल्पना पर छोड़ देना। बुज़ुर्ग की बात सबसे महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह बिरजू महाराज के ही शब्दों का अर्थ दोहरा देती है। वे भी कहते हैं कि परंपरा कायम है और बदलाव केवल प्रस्तुतीकरण में हुआ है। यहाँ यह भी दिखता है कि बदलाव पर नाराज़गी स्वाभाविक है, पर उसका उत्तर परंपरा और ढंग का अंतर समझने में मिलता है।
Activity:
अपने क्षेत्र का कोई एक पुराना आयोजन चुनिए। कॉपी में दो खाने बनाकर लिखिए कि उसमें क्या वैसा ही रहा और क्या ढंग बदल गया।
संकेत से दृश्य बनाइए
Title:
संकेत से दृश्य बनाइए
Safety:
पर्चियों पर किसी साथी का नाम न लिखिए, केवल काम या दृश्य लिखिए।
What You Notice:
आप देखेंगे कि तीन शब्दों वाले संकेत पर हर बच्चे की तस्वीर अलग बनती है। यही बात पाठ में है, जहाँ अब केवल गत का नाम कहकर बाक़ी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।
Did you know
पिछले दो वर्षों में उन्होंने लगभग सत्तर चित्र बनाए थे।
नर्तक न होते तो वे शायद इंजीनियर बनते, क्योंकि मशीनों में उनका मन ख़ूब लगता था।
वे प्रायः रात बारह बजे के बाद चित्र बनाने बैठते थे।
Memory tricks
पहले और अब — पहले चाँदनी और पूरा वर्णन, अब मंच और कल्पना।
वृक्ष वाला सूत्र — छाया एक जैसी, बैठने वाले अलग-अलग।
Practice MCQs with answers (25)
- A कि दोनों एक ही चीज़ हैं
- B कि भीतर की चीज़ वही रही और सामने रखने का ढंग बदला
- C कि दोनों ही बदल दिए गए
- D कि दोनों ही पहले जैसे रखे गए, कुछ भी नहीं बदला गया
Show answer
Why:
इसी कारण वे नई चीज़ें जोड़ने पर भी परंपरा कायम कह पाते हैं।
- A किसी कला को शुरू से सीखने का क्रम और उसके नियम
- B किसी कला को दर्शकों के सामने रखने का ढंग
- C किसी कला का पुराना इतिहास और उसकी पूरी परंपरा
- D किसी कला को सिखाने की लंबी तालीम
Show answer
Why:
उन्होंने परंपरा नहीं बदली, यही ढंग बदला।
- A उनकी पोशाक का ढंग और रंग
- B उनके तबले की बोलियाँ और उन पर बैठी ताल
- C उनके खड़े होने का निराला अंदाज़
- D उनके गाने की शैली और स्वर लगाने का ढंग
Show answer
Why:
वह कोई सिखाई गई मुद्रा नहीं थी, पर उन्होंने उसे कथक में शामिल किया।
- A किसी एक की नक़ल करना
- B परंपरा को पूरी तरह छोड़कर कुछ नया गढ़ लेना
- C कोई पुरानी रचना जैसी थी वैसी ही दोहरा देना
- D तीन धाराओं को मिलाकर एक नई धारा बनाना
Show answer
Why:
इसीलिए वे कहते हैं कि परंपरा कायम रहते हुए भी नया रूप बन सकता है।
- A दोनों एक ही भाषा के कवि रहे होंगे
- B दोनों कथक नर्तक थे
- C दोनों अलग-अलग भाषाओं के कवि थे
- D दोनों उनके गुरु थे
Show answer
Why:
उनकी रचनाओं पर भी बिरजू महाराज ने कथक रचनाएँ तैयार कीं।
- A कि भाषा सीख लेनी चाहिए
- B कि इंसान सब जगह एक-से होते हैं
- C कि अनुवाद करा लिया जाता है
- D कि दर्शक को समझने की ज़रूरत नहीं
Show answer
Why:
इसी उत्तर से भाषा की दीवार हट जाती है।
- A कि वे कृष्ण की माता का नाम भूल गए हैं
- B कि यह केवल भारत की कथा है
- C कि इस धरती की सब माँएँ यशोदा जैसी हैं
- D कि यशोदा एक नृत्य-मुद्रा का नाम है
Show answer
Why:
उन्होंने यह भी कहा कि सब नन्हें बच्चे कृष्ण हैं।
- A जन्म के समय से ही
- B कथा सुनने के बाद से
- C विद्यालय जाने और किताबें पढ़ने के बाद से ही
- D जब धीरे-धीरे अलग भाषा और तौर-तरीके मिलते हैं
Show answer
Why:
ज़िद, रोना, उठना और बैठना, सब जगह एक जैसा होता है।
- A किसी नदी के समान, जो आगे ही आगे बहती चली जाती रहती है
- B किसी वृक्ष के समान, जो सबको एक जैसी छाया देता है
- C किसी दीपक के समान, जो चारों ओर का अँधेरा दूर कर देता है
- D किसी मंदिर के समान, जहाँ सब आते हैं
Show answer
Why:
उसके नीचे बैठने वाले लोग अलग-अलग स्वभाव के होते हैं।
- A छाया एक है और बैठने वाले अनेक
- B छाया अनेक है और बैठने वाले एक
- C छाया और बैठने वाले, दोनों एक जैसे हैं
- D छाया और बैठने वालों का कोई संबंध नहीं
Show answer
Why:
यानी परंपरा सबको समान देती है, पर हर व्यक्ति अलग रहता है।
- A केवल I और II
- B केवल II और III
- C केवल I और III
- D I, II और III
Show answer
Why:
I और II सही हैं। तीसरा कथन ग़लत है, क्योंकि नया वृक्ष उसे मिलने वाली हवा, पानी और खाद के अनुसार बनेगा।
- A चाँदनी
- B चादर
- C दरी
- D चटाई
Show answer
Why:
चाँदनी यानी बिछाने की बड़ी सफ़ेद चादर।
- A चाँद की चारों ओर फैली रोशनी
- B कोई सफ़ेद-सी लंबी-चौड़ी पोशाक
- C बिछाने की बड़ी सफ़ेद चादर
- D किसी तरह की चमकती चाँदी
Show answer
Why:
नर्तक उसी पर नाचता था और सुनने वाले उसके चारों ओर बैठ जाते थे।
- A वे बहुत दूर खड़े होकर ही देखते थे
- B वे खड़े रहते थे
- C वे कुछ देख ही नहीं पाते थे, इसलिए दूर चले जाते थे
- D वे नर्तक के चारों ओर बैठते थे
Show answer
Why:
आज दर्शक केवल सामने की ओर बैठते हैं।
- A ग़लत, चेहरे पर चंदनलेप और होंठों पर पान
- B सही, दोनों का यही उपयोग था
- C सही, पर केवल बड़े कलाकारों के लिए
- D ग़लत, तब शृंगार ही नहीं किया जाता था
Show answer
Why:
दोनों का उपयोग उलटा था, और यही ध्यान से पढ़ने की बात है।
- A केवल गत का नाम बोलकर आगे बढ़ जाते थे, जल्दी में, कहीं भी ठहरते ही नहीं थे
- B पूरा दृश्य इतना विस्तार से बताते थे कि वह आँखों के सामने खिंच जाए
- C दर्शकों से बीच-बीच में प्रश्न पूछते रहते थे, अपने मंच से ही, बिना रुके
- D कोई गीत गा देते थे और आगे बढ़ जाते थे, बहुत ही जल्दी, कहीं बिना रुके
Show answer
Why:
घड़ा उठाना, पनघट की ओर चलना और कंकड़ मारना, सब बताया जाता था।
- A पूरा वर्णन पहले की तरह दोहराकर, एक-एक ब्योरे के साथ
- B पहले से बना रखा कोई बड़ा चित्र दर्शकों को दिखाकर
- C केवल गत का नाम कहकर, बाक़ी दर्शक की कल्पना पर
- D कोई कथा सुनाकर
Show answer
Why:
इसका अर्थ यह नहीं कि कला घट गई।
- A कि अब दर्शक से भी भागीदारी की आशा की जाती है
- B कि नर्तक को अब पहले जितनी मेहनत नहीं करनी पड़ती
- C कि कथा का महत्त्व घट गया है
- D कि दर्शक को कुछ समझ नहीं आता
Show answer
Why:
पहले सब कुछ नर्तक ही बता देता था।
- A कि उसे रोक देना चाहिए
- B कि बरतन छिपा देने चाहिए
- C कि उसके हाथ में लय है
- D कि उसे पढ़ने भेज देना चाहिए
Show answer
Why:
बिरजू महाराज के बारे में चाचा ने ठीक यही कहा था।
- A चाचा आ गए और वे सब उतारकर छिप गए
- B सबने ख़ूब तालियाँ बजाईं, जो देर तक बजती रहीं
- C बहनों ने उन्हें वहीं पर रोक दिया, आगे जाने नहीं दिया
- D उन्हें दरबार में बुला लिया गया, गाने को
Show answer
Why:
बहनों ने उन्हें बिंदी और चुन्नी से सजा दिया था।
- A चित्रकार
- B इंजीनियर
- C शिक्षक
- D गायक
Show answer
Why:
मशीनों में उनका मन ख़ूब लगता था।
- A कि उनकी जिज्ञासा हर समय साथ चलती थी
- B कि उन्हें यात्रा पसंद थी
- C कि वे हर समय बहुत सामान साथ रखते थे
- D कि वे मशीनें बेचते थे
Show answer
Why:
कोई भी यंत्र खोलकर कल-पुर्ज़े देखने की जिज्ञासा उन्हें रहती थी।
- A कि बच्चे को केवल पढ़ाई कराएँ
- B कि बच्चे को किसी अच्छे घराने में ही भेज दिया जाए
- C कि बच्चे से हर दिन अभ्यास करवाएँ
- D कि बच्चे की रुचि हो तो उसे लय के साथ खेलने दें
Show answer
Why:
उसी खेल में संतुलन और समय का अंदाज़ा भी हाथ आ जाता है।
- A दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को समझाता है
- B दोनों सही हैं; कारण अभिकथन को नहीं समझाता
- C अभिकथन सही है; परंतु उसका कारण ग़लत है
- D अभिकथन ग़लत है; परंतु उसका कारण सही है
Show answer
Why:
दोनों सही हैं और कारण अभिकथन को समझाता है। धन छिन सकता है, सीखा हुआ हुनर नहीं, इसलिए वही सबसे सुरक्षित खज़ाना है।
- A कि कला किसी काम की नहीं होती, उससे कुछ भी नहीं मिलता
- B कि कला सीखने से बच्चे की पढ़ाई पीछे छूटती चली जाती है
- C कि कला केवल बड़ों के लिए है
- D कि लय अनुशासन, संतुलन और समय का अंदाज़ा सिखाती है
Show answer
Why:
वे इसे बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
Important short questions (7)
उन्होंने पुरानी परंपरा को कायम रखा और केवल प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए। यानी भीतर की चीज़ वही रही और उसे सामने रखने का ढंग बदल गया।
कि कला भाषा से बँधी नहीं होती। उन्होंने कहा कि हर माँ यशोदा ही है और हर छोटा बच्चा कृष्ण, इसलिए भाव हर जगह समझ लिया जाता है।
छाया और आश्रय वृक्ष सबको एक-सा देता है, पर उसके नीचे बैठने वालों के स्वभाव अलग-अलग रहते हैं। उसी तरह परंपरा सबको समान देती है, पर हर व्यक्ति अपना रूप बनाए रखता है।
पहले मंच नहीं होते थे और फ़र्श पर चाँदनी बिछाई जाती थी। दर्शक चारों ओर बैठते थे, न कि केवल सामने। पहले पूरा दृश्य बोलकर बताया जाता था, और अब केवल गत का नाम कहा जाता है।
क्योंकि अब दर्शक से भी भागीदारी की आशा की जाती है। पहले सब कुछ नर्तक ही बता देता था, और अब दर्शक का मन भी दृश्य बनाने में लगता है।
वे कोई भी मशीन खोलकर उसके कल-पुर्ज़े देखना चाहते थे, इसलिए ब्रीफ़केस में हरदम पेचकस रखते थे। उन्होंने अपना पंखा और फ्रिज तक स्वयं ठीक किया।
ताकि वे आत्मनिर्भर हो सकें। उनके अनुसार हुनर ऐसा खज़ाना है, जिसे कोई छीन नहीं सकता और वक़्त पड़ने पर वही काम आता है।
Long answer questions (3)
पहली बात यह है कि उन्होंने परंपरा नहीं बदली, केवल प्रस्तुतीकरण बदला। दूसरी बात भाव-भंगिमाओं की है। उन्होंने देखा कि बाबूजी और चाचा लोगों के खड़े होने का अंदाज़ भी निराला था, और उन्होंने उन भंगिमाओं को कथक में शामिल कर लिया। तीसरी बात शिक्षा के मेल की है। बाबूजी और दोनों चाचा, तीनों की शिक्षा इकट्ठा करके उन्होंने एक नया रूप तैयार किया। चौथी बात नई रचनाओं की है। उन्होंने टैगोर और त्यागराज जैसे कवियों की रचनाओं पर भी कथक रचनाएँ बनाईं, और भाषा के अंतर को बाधा नहीं माना। इन सब बदलावों में एक बात समान है, कि जड़ वही रही और ऊपर नई शाखाएँ निकलीं।
पहले मंच नहीं होते थे। फ़र्श पर चाँदनी, यानी बिछाने की बड़ी सफ़ेद चादर बिछाई जाती थी और उसी पर कथक होता था। दर्शक चारों ओर बैठते थे, इसलिए नर्तक को हर दिशा का ध्यान रखना पड़ता था। शृंगार भी उसी समय के साधनों से होता था, क्योंकि चेहरे पर चंदनलेप और होंठों पर पान का उपयोग किया जाता था। सबसे बड़ा अंतर कथा कहने के ढंग में है। पहले नर्तक पूरा दृश्य इतना विस्तार से बताते थे कि वह दर्शक की आँखों के सामने खिंच जाता था। अब केवल गत का नाम कह दिया जाता है और बाक़ी दर्शक की कल्पना पर छोड़ा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि कला घट गई, बल्कि अब दर्शक से भी भागीदारी की आशा की जाती है।
वे बच्चों से सीधे कहते हैं कि संगीत ज़रूर सीखो, क्योंकि मन की शांति के लिए यह बहुत ज़रूरी है। आगे वे लय का लाभ बताते हैं, कि वह हमें अनुशासन और संतुलन सिखाती है। इसके बाद वे एक और बात जोड़ते हैं। नाचने, गाने और बजाने वाले आपस में तालमेल बैठाकर एक नई रचना करते हैं, इसलिए संगीत अकेले का काम नहीं है। इसी से सुर और लय हमें एक-दूसरे का सहयोगी बनकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। लड़कियों के बारे में उनका संदेश अलग से ज़रूरी है, कि उनके पास शिक्षा या कोई हुनर अवश्य होना चाहिए। हुनर ऐसा खज़ाना है जिसे कोई छीन नहीं सकता, और वक़्त पड़ने पर वही काम आता है।
Flashcards (17)
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- उनका सफ़र क्रम में
- शब्द और अर्थ
- पहले या अब
- सही या भ्रम
- झटपट उत्तर
Class 7 Hindi Chapter 8 — frequently asked questions
पहले दौर में उनका परिवार छोटे नवाब कहलाता था और हवेली पर पहरा रहता था। दूसरे दौर में, बाबूजी के देहांत के बाद, आर्थिक परेशानियाँ बढ़ गईं।
कभी कर्ज़ लिया जाता था, कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचे जाते थे। कभी नृत्य के कार्यक्रमों से थोड़ा पैसा आ जाता था।
क्योंकि उसमें भोजन और अभ्यास को आपस में तौला गया है। भूख के सामने भी उन्होंने अभ्यास को भारी रखा, और इसी नियम से कला बची रही।
महाभारत के आदिपर्व और रामायण, दोनों में इसकी चर्चा मिलती है। इसी से पता चलता है कि यह नृत्य बहुत पुराना है।
शुरू में वह कथा कहने का रोचक और अनौपचारिक ढंग था, जिसके नियम बँधे नहीं थे। तब वह मंदिरों तक सीमित था, जबकि आज वह मंच का शास्त्रीय नृत्य है।
एक बार नौ कथिक उस नाले के पास से गुजर रहे थे और वहाँ तीन डाकू आ पहुँचे। कुछ कथिक डर गए, पर कला में ऐसी ताक़त थी कि डाकू अपना काम भूलकर उस नृत्य में डूब गए।
उन्होंने पुरानी परंपरा को कायम रखा और केवल प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए। यानी भीतर की चीज़ वही रही और उसे सामने रखने का ढंग बदल गया।
कि कला भाषा से बँधी नहीं होती। उन्होंने कहा कि हर माँ यशोदा ही है और हर छोटा बच्चा कृष्ण, इसलिए भाव हर जगह समझ लिया जाता है।
छाया और आश्रय वृक्ष सबको एक-सा देता है, पर उसके नीचे बैठने वालों के स्वभाव अलग-अलग रहते हैं। उसी तरह परंपरा सबको समान देती है, पर हर व्यक्ति अपना रूप बनाए रखता है।
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